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By admin / January 30, 2017

धर्म की रक्षा का प्रश्न, परन्तु श्रेष्ठजन दमनचक्र: पं. मांगेराम शर्मा जी की कलम से (21 अप्रैल, 1988)

एक समय था, महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र, जमदग्नि और अंगिरा, गौतम और कण्व के आश्रमों से निकलती दिव्य ऋचाओं की ध्वनि आर्यों की उत्कृष्ट आत्मा को शब्दों में व्यक्त कर रही थी। parshuram-jayanti-001_146इस भूमि में जो राजा लोक सत्ता भोगते थे वे चक्रवर्ती, जो तप करते थें वे ऋषि और जिन्होंने ऋचाओं का उच्चारण किया था वे मन्त्रदृष्टा प्रचलित प्रथाओं का स्तर ऊँचा करते थे। जो संस्कार प्रकट हुए...

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